भाषा का अर्थ, स्वरूप व उपयोगिता Hindi Grammar

Meaning, form and utility of language

भाषा का अर्थ Meaning of Language in Hindi

मानव, ईश्वर की सृष्टि का एक सर्वश्रेष्ठ एवं बुध्दिमान प्राणी है। सभ्यत के आदिकाल से, अनेक कारणों से उसने समाज का निर्माण किया। पारस्पारिक संपर्क के लिये ​उसे भाषा की आवश्यकता पडी क्योंकि विचारों की अभिव्यक्ति एक सर्वग्राहा भाषा के अभाव में असंभव थी। इस प्रकार मानव के विकास के साथ ही भाषा का जन्म हुआ।

सामान्य अर्थ— भाषा वह माध्यम हैं जिसके द्वारा हम एक—दूसरे के विचारों को समझकर पारस्पारिक संपर्क को निकटता में बदलते हैं।

‘पूर्व निश्चित ध्वनि एवं उच्चारित संकेतों का वह समूह जो मानव के पारस्पारिक संपर्क को गहन बनाकर विचारों की अभिव्यक्ति में सहायता करता है, उसे भाषा कहते हैं।’

अत: हम कह सकते हैं कि ​भाषा संकेतों का समूह है, वह इच्छा पर आधारति है, सीमीति रूप में रूढ़ है।

अत: भाषा केवल सार्थक समूहों या ध्वनियों का ही वह समूह है जो हमारे भावों को व्यक्त करने में सहायता करता है। निरर्थक ध्वनियों का कोई अर्थ या महत्व नही हौं। उदाहरण के लिये शेर, पत्थर, मारो, आया ये ध्वनियों या संकेत के रूप में होने से भाव व्यक्त करने में सक्षम नही हैं। अत: इसे हम भाषा नही मान सकते।

भाषा इच्छा पर आधारति है। इसमें वर्ण या शब्दों का कोई पारस्परिक संबध नही हैं। जैसे:— बंदर, कोयल और पत्थर इसमें आपस में कही संबध नही हैं। ये केवल संबोधन हैं। इन्हे नाम कह सकते हैं।

सामान्य होने पर भी विशेष परिस्थितियों में समय तथा जन—सामान्य एवं समाज की प्रकृति इन ध्वनियों तथा संकेतो को रूढ़ और जटिल बना देते हैं।

भाषा की परिभाषा Definition of Language

हिन्दी भाषा के कुछ प्रसिध्द व्याकरणविदों ने भाषा को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया है।

(क) ‘मनुष्य और मनुष्यों के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा का आदान—प्रदान करने के लिये व्य​क्त किये जाने वाले ध्वनि—संकेतों का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते हैं।’ — डॉ. श्याम सुंदर दास

(ख) ‘जिन ध्वनि—चिन्हों द्वारा मानव परस्पर विचार—विनिमय करता है, उसको समष्टि रूप से भाषा कहते है।’ — डॉ. बाबूराम सक्सैना

(ग) ‘भाषा मनुष्यों की उस चेष्टा या गतिविधि को कहते हैं जिससे मनुष्य अपने उच्चारणोपयोगी शरीरवयवों से उच्चारण किये गये वर्णनात्मक या व्य​क्त शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करते हैं।’ — डॉ. मंगलदेव ​शास्त्री

(घ) ‘ भाषा की ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था होती है, अर्थात भाषा में विभिन्न ध्वनियां मिलकर अर्थवान शब्द बनाती हैं। इन अर्थवान शब्दों के मेल से ही मानव दूसरे के भावों को समझता है तािा अपने भाव दूसरों तक पहुंचाता है।’ — डॉ. रवि प्रकाश शास्त्री

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम निम्नवत विचार प्रकट कर सकते हैं—
(1) भाषा में निश्चित ध्वनि का प्रयोग परंपराओं के अनुसार होता है जो साधारणतय बाद में रूढ़ हो जाती है।
(2) मन के विचारों को, एक मानव के रूप में व्यक्त करने के लिये हम उन्ही संकेतों का प्रयोग करते हैं, जिन्हे समाज की मान्यता प्राप्त है।
(3) ये ध्वनि संकेत प्रत्येक समाज को अपने मानकानुसार निश्चित हैं।

भाषा का स्वभाव Nature of Language

भाषा का स्वभाव् एक कल—कल निनाद करती सरिता के समान सतत् प्रवाहमान हैं। भाषा के गुण या स्वभाव को उसकी प्रकृति कहते हैं। हर भाषा की अपनी एक प्रकृति तथा उसके आंतरिक गुण या अवगुण होते हैं। भाषा एक ऐसी सामाजिक शक्ति होती है जो केवल मानव को ही प्राप्त होती है। भाषा रूपी हथियार होने से ही मानव पथ्वी पर अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना जाता है। यहां तक की तोता भी केवल कुछ शब्द रटने तथा उनको दोहरा लेने की क्षमता के कारण ही पक्षियों में सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। मानव उसे अपने पूर्वजों से प्राप्त कर विकास करता है। अत: भाषा परम्परागत एवं अर्जित दोनो ही है। एक शक्तिशाली भाषा, सरिता के समान निरंतर प्रवाहमान रहती है। भाषा के कथित और लिखित दो रूप हैं। हम इसका प्रयोग कथन के रूप में (बोलकर) तथा ​लिखकर दोनो रूप में करते हैं। देश और काल के अनुसार भाषा के रूप में परिवर्तित होता रहा है। यही कारण हैं कि संसार में अनेक भाषाएं प्रचलित हैं।

भाषा का निर्माण वाक्यों से हुआ है। वाक्य शब्दों से तथा शब्द ध्वनियों से बने हैं। इस प्रकार वाक्य शब्द और मूल ध्वनियों के अभिन्न अंग हैं। व्याकरण में इन्ही अंग प्रत्यांगो का अध्ययन एवं विवेचन होता है। अत: व्याकरण भाषा पर ही आधारित है।

भाषा के रूप

हर देश में भाषा के विविध रूप मिलते हैं— (1)बोलियां, (2) व्याकरण सम्मत या साहित्यिक भाषा।

(1) बोलियॉं — जिन स्थानीय बोलियों का प्रयोग मानव अपने समूह या घरों में करता है, उसे बोली कहते हैं। भारत में प्रचलित ऐसी बोलियों की संख सैकड़ो में हैं। इन बोलियों का जन्म बनों में घास—पतवार के समान होता है। इनका क्षेत्र सीमित होता है। जैसे— भोजपुरी, मगही, बृजभाषा तथा अवधी, राजस्थानी, हरियाणवी आदि।

(2) व्याकरण सम्मत भाषा — यह भाषा व्याकरण पर आधारित होती है तथा व्याकरण द्वारा ही नियंत्रित होती है। इसका प्रयोग शिक्षा, शासन और साहित्य में होता है। जब कोई भाषा व्याकरण द्वारा परिष्कृत की जाती है तब उस भाषा को शुध्द भाषा कहते हैं। उदाहरण के लिये खड़ी बोली कभी एक स्थानीय बोली थी जो वर्तमान में व्याकरण सम्मत एवं संस्कारित होने के बाद एवं परिनिष्ठित होकर साहित्यिक भाषा बन गई है। इस साहित्यिक भाषा का आज प्रयोग भारत के बड़े भूभाग में होता है। वर्तमान में 15 विकसित भाषाओं में से सरकार और संविधान ने हिन्दी (खड़ी) को ही राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा का सम्मान दिया है।

इस प्रकार प्रत्येक देश की अपनी विकसित राष्ट्रभाषा है। जिसमें उन देशों के प्रशासनिक तथा शासनिक कार्य चलते हैं। जैसे इटली देश में इटैलियन, चीन में चीनी, सऊदी अरब में अरबी तथा भारत में हिन्दी।

हिन्दी भाषा की उत्पत्ति — भाषा विकास के पथ पर सदैव अग्रसर रहती है। मार्ग की हर बाधा को, हर दशा में पारकर विकास के पथ पर अग्रसर होती रहती है। यही भाषा की स्वाभिक प्रकृति है। हर भाषा के इतिहास में ये बात देखने को मिलती है।

भारत एक प्राचीन राष्ट्र होने के कारण यहां के निवासी विभिन्न काल में विभिन्न भाषा बोलते आये हैं। प्राचीनतम भाषा होने के कारण संस्कृत का प्रयोग हमारे विद्वानों और कवियों द्वारा समय सयम पर किया गया है। इसका प्राचीनतम रूप ‘वेदों’ में देखने को मिलता है। संस्कृत का आर्यभाषा या देवभाषा भी कहा गया है। वर्तमान हिन्दी इसी भाषा की उत्तराधिकारिणी हे। इसे निम्नवत समझाया जा सकता है—

भारत आर्यभाषा संस्कृत का इतिहास लगभग 3500 वर्ष पुराना हैं। इसे तीन भागों में विभक्त किया गया है।

प्रथम काल — इस युग में चारों वेद, ब्राह्मण और उपनिषदों की रचना हुई। इनकी रचना वैदिक संस्कृत में हुई। इस काल की भाषा का रूप एक समान नही हैं। इस भाषा की प्राचनीतम ऋगवेद संहिता में देखने को मिलता है। इस युग तक आर्य पंजाब तक पहुंच गये थे। आर्यों द्वारा शनै: शनै: पूर्व की ओर प्रसार के साथ ही वैदिक भाषा का प्रसार होता गया। इस युग में भाषा विद्वानों और मनीषियों तक ही सीमित थी। जनसाधारण तक इसका प्रसार नही हुआ था।

संस्कृत के इस लौकिक रूप का प्रयोग दर्शन ग्रंथों और साहित्य में हुआ। इस भाषा में रामायण, महाभारत एवं नाटकों के साथ व्याकरण ग्रन्थ भी लिखे गये। पाणिनि और कात्यायन ने इस दूषित रूप का संस्कारित कर उसे परिनिष्ठित करके पंडितों के लिये मानक निश्चित किया।

इस प्राचीन आर्यभाषा की निम्नलिखित विशेषताऐं हैं— (1) भाषा योगात्मक थी। (2) शब्दों में धातुओं का अर्थ सुरक्षित था। (3) भाषा अधिक नियमबध्द थी। (4) भाषा संगीतात्मक थी। (5) लिंग और वचन की संख्या तीन—तीन थी। (6) पदों का स्थान निश्चित न था। (7) शब्द—भंडार में तत्सम शब्दों का आधिक्य था। (8) दक्षिण के अनेक द्रविड़ शब्दों का प्रयोग आरम्भ हो गया था।

मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा काल (500ई. पू. से 1000 ई.) – 500 ई. पू. से 1000 ईस्वी तक भारतीय आर्यभाषा एक नये युग में प्रवेश कर नवीन भाषा की रचना एवं विकास करती रही। मुख्यत: इस युग में लोकसभा का विकास हुआ। परिणामत: सामने आने वाला लोकभाषा का रूप प्राकृत था। वैदिक और लौकिक संस्कृत के मध्य बोलचाल की जो भाषा दबी पड़ी थी, अनुकूल समय एवं उचित परिस्थितियां पाकर उसने सिर उठाया और प्राकृतिक विकास पाकर प्राकृत के रूप में सामने उपस्थित हुई।

पाली यह भारत की प्राचीनतम देश भाषाा है जो प्राचीन प्राकृत भी कहलाती है। भगवान बुध्द तथा उनके अनुयायियों ने इसी भाषा में जन साधारण को उपदेश दिये। इससे पता चलता है कि इस भाषा की जनसाधारण में पूर्ण बैठ थी तथा भाषा प्रथम देशभाषा कहलाने की वास्तव हकदार थी। सिंघल या श्रीलंका में यह भाषा मगधी कहलाती है क्योंकि इस भाषा का जन्म भारत के मगध प्रदेश में हुआ था। इसमें तत्कालीन अनेक बोलियों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है इन शब्द में तद्भव अधिक मात्रा में हैं।

प्राकृत के निम्न 5 भेद हैं— शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री, अध्र्दमागधी, मागधी

शौरसैनी— शौरसेनी प्राकृत का क्षेत्र संभवत: मथुरा के समीप का शौरसैनी प्रदेश था। यह मध्यप्रदेश की प्रमुख भाषा थी, जिस पर संस्कृत का भी प्रभाव था। मध्य प्रदेश उस काल में संस्कृत का प्रमुख केन्द्र था। बाद में यही हिन्दी का भी मूल केन्द्र बन गया।

पैशाची — प्राकृत उत्तर—पश्चिम में कश्मीर के आस—पास के क्षेत्र की भाषा थी।

महाराष्ट्री— महाराष्ट्र का क्षेत्र महाराष्ट्री प्राकृत का केन्द्र था। वर्तमान में मराठी भाषा इसी का विकसित रूप है।

अर्ध्द मागधी— अर्ध्द मागधी प्राकृत का क्षेत्र मागधी और शौरसेनी के मध्य का है। यह भाषा प्राचीन कौशल प्रदेश के आस—पास प्रचलित थी। इस भाषा का प्रयोग जैन साहित्य में अधिक है।

मागधी— मागधी प्राकृत मगध प्रदेश तथा उसके आस—पास प्रचलित थी। सन 1000 ईसवी से भारतीय आर्यभाषा नये युग में प्रवेश करती है। मध्यकालीन आर्यभाषा का चरम विकास अप्रभंश में हुआ। लोकभाषा (अप्रभंश) ने परिनिष्ठित प्राकृतों के विरूध्द विद्रोह कर दिया। यह पंडितो की भाषा पर जनता की विजय थी, जो अप्रभंशो में बलवती हुई। अपभ्रंश का अर्थ है— बिगड़ा हुआ, गिरा हुआ और भ्रष्ट। यह नाम पंडितों द्वारा दिये गये जिन्हे लोकभाषा सदैव ही इसी रूप में दिखाई दी। आधुनिक आर्य भाषाओं जैसे हिन्दी, बंगला, गुजराती, मराठी, उर्दू, पंजाबी और उडिया आदि की उत्पत्ति इन्ही अपभ्रंशो से हुई है। इस प्रकार ये अपभ्रंश भाषाऐं प्राकृत तथा आधुनिक आर्य भाषाओं के मध्य कड़ियां हैं। प्राकृत भाषाओं के समान अपभ्रंश के व्याकरण सम्मत रूप का विकास भी मध्यप्रदेश मेें हुआ था। इस पर अन्य रूपों का प्रभाव है। हिन्दी का जन्म इसी मध्य प्रदेश में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के मिश्रण से हुआ है। उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात भेद प्रचलित थे। जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ।

अपभ्रंश में वे ही ध्वनियां थी जिनका प्रयोग प्राकृत होता था। स्वरों का अनुनासिक रूप संस्कृत, पाली और प्राकृत के समान था। कुछ बातों में समानताओं के बाद भी अपभ्रंश और संस्कृत प्राकृत और बहुत दूर थी तथा प्राचीन की अपेक्षा आधुनिक भाषाओं के निकट थी।

अपभ्रंश भाषा का समय 1100ई. तक माना माना जाता है। उसके पश्चात आधुनिक भाषाओं का युग आराम्भ हो गया। 14वीं शताब्दी में आधुनिक भाषाओं का स्पष्ट रूप सामने आने लगा। कुछ समय प्रयुक्त होने के पश्चात अपभ्रंश की ये पृवत्तियां आधुनिक भाषाओं से शनै: शने: लुप्त हो गयीं। इस काल में ‘संदेश रासक’ ‘प्राकृत पैगलम’ ‘कीर्तिलता’ जैसे ग्रंथो की रचना की गई। जिसके अध्ययन में अपभ्रंश से प्रभावित पुरानी हिन्दी के कुछ रूप देखे जा सकते है। इस काल की भाषा को कुछ लोगों ने अवहदृ नाम से पुकारा है। इस काल के कुछ कवि ​’विद्यापति’ तथा वंशीधर ने तत्कालीन भाषा अवहदृ की संज्ञा दी है। अवहदृ अपभ्रंश का ​ही विकृत रूप है। वास्तव में संक्रान्ति काल में जिस नयी भाषा का विकास हो रहा था। उसे पुरानी हिन्दी, पुरानी बंगला, पुरानी (जूनी) तथा गुजराती आदि कहना ही उचित है। उक्त बातों से स्पष्ट है कि अपभ्रंश के विभिन्न रूपों से ही हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। ये सभी भाषाऐं सरलता की ओर है। इस प्रकार भाषा सरल होती गई। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाकाल (1000 ईं. से आत तक ) 1000ईं तक हिन्दी भी अन्य वर्तमान भारतीय भाषाओं के समान अस्तित्व में आ चुकी है।

भाषा के रूप में हिन्दी की प्रकृति रचनात्मक है। हिन्दी अपने प्रत्ययों से नवीन शब्दों का निर्माण कर लेती है। यह विशेषता अंग्रेजी भाषा को प्राप्त नही हैं। इस प्रकार आर्यभाषाओं में हिन्दी की दूसरी विशेषता रही है। ये तद्भव हिन्दी के प्राण हें। हिनछी जनता की भाषा है। जनता की गोद में इसका जन्म और विकास होने के कारण यह उसके गले का हार है। इसीलिये यह विद्वानों तक सीमित न रहकर, आज भी जनमानस के द्वारा प्रयोग की जाती है। इसलिये इसके लुप्त होने या समाप्त होने की संभावना नगण्य है। अलंकार और तत्समों का अधिक भार लादना हिन्दी की स्वाभिक शोभा को नष्ट करना हैं। समय समय पर चलते शब्दों के प्रयोग को जनता ने अपनी धरोहर माना है।

हिन्दी की मूल उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश (पश्चिमी हिन्दी) से मानी गई है। अनेक बोलियां प्रचलन में होने के बाद भी खड़ी बोली ने ही आधुनिक प्रचलित हिन्दी का रूप धारण करनें में सफलता पाई तथा खड़ी बोली ही ​असली हिन्दी बन गई। यह विगत दो सौ वर्षों तक विकसित हो रही है। इसकी समृध्दि में हिन्दी की सभी बोलियों का योगदान हे। यही इसके राष्ट्रव्यापी प्रसार का मुख्य कारण है।

जॉन वीम्स के विचार में आधुनिक आर्य भाषाओं में हिन्दी को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होने कुरूक्षेत्र तथा बृज क्षेत्र को हिन्दी का मुख्य क्षेत्र माना। शिक्षितों के द्वारा एक रूप में (खड़ी बोली) बोली और समझी जाती है। हिन्दी के महत्व को प्रतिपादित करते हुये वीम्स महोदय ने लिखा है।’ हिन्दी संस्कृत की वास्तविक उत्तराधिकारिणी है और आधुनिक युग में उसका वही स्थान है जो अतीत में संस्कृत का था।’

हिन्दी का संक्षिप्त इतिहास

हिन्दी भाषा का जन्म उत्तर भारत में हुआ तथा इसका नामकरण ईरानी तथा भारत के मुसलमानों ने किया। वास्तव में हिन्दी किसी विशेष धर्म सम्प्रदाय की भाषा न होकर जनसाधारण की भाषा है। हिन्दी के सम्बन्ध में मुख्यतः तीन अर्थ या धारणाऐं प्रचलित हैं। (1) व्यापक अर्थ, (2) सामान्य अर्थ, (3) विशिष्ट अर्थ।

व्यापक अर्थ – मुसलमानों के भारत आगमन से पूर्व हिन्दी का व्यापक अर्थ में प्रयोग होता था। इस अर्थ में हिन्दी ‘हिन्दी भारत से संबध्द किसी भी व्यक्ति, वस्तु या भारत में बोली जाने वाली किसी भी आर्य में द्रविण या अन्य भारतीय भाषाओं के लिये प्रयुक्त होती थी। आरम्भ में यह शब्द देश बोधक था। कुछ विद्वान ‘हिन्दी‘ को सिन्धी‘ से सम्बध्द मानते थे क्योकि ईरानी ‘स‘ के स्थान पर ‘ह‘ शब्द का प्रयोग करते हैे। इस रूप में ‘हिन्दी‘ का प्रयोग वर्तमान काल मे नही होता। आज ‘हिन्दी‘ का प्रयोग भारतीय संघ की भाषा के रूप में (भारतीय संविधान में) होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी इस रूप इन शब्दों का प्रयोग दिखाई नही देता।

सामान्य अर्थ – सम्राट अकबर के कवि रहीम को हिन्दी का कवि माना जाता है। अतः यह संभव है कि मध्य युग में देशी भाषा (भाखा) हिन्दी और ‘हिन्दवी‘ आदि समानर्थी थे।

दक्षिण के 16-17 वीं मुस्लिम कवियों ने भी (दक्खिनी-हिन्दी कवि) भी ‘हिन्दी‘ शब्द का बड़ी मात्रा में प्रयोग किया है।

ड़ाॅ. धीरेन्द्र वर्मा के विचार में 17वीं सदी तक हिन्दी (हिन्दवी) समानार्थी थे तथा मध्य प्रदेश की भाषा के लिये प्रयोग होते थे। अतः स्पष्ट है कि हिन्दी का नामकरण अरबी और ईरानी तथा भारतीय मुस्लमानों ने किया, हिन्दुओ नही। इन्होने विभिन्न बोलियों के स्थान पर दिल्ली तथा मेरठ में प्रचलित खड़ी बोली महत्व दिया। समय के साथ हिन्दुओ ने भी मुसलमानों के समान ब्रजभाषा, अवधी तथा बोलियों को महत्व दिया। समय के साथ हिन्दुओ ने भी मुसलमानों के समान ‘खड़ी बोली‘ को ही रचनाओं का आधार बनाया। अतः स्पष्ट है कि मुस्लिम कवियों द्वारा अपनाई खड़ी बोली को ही बाद में हिन्दी साहित्य का आधार बनीं। यही साधुओं की भाषा के रूप में विकसित हुई। इस प्रकार संत, फकीरों के प्रयास से हिन्दी का प्रसार सम्पूर्ण देश में हुआ।

विशिष्ट अर्थ- प्रारम्भ में हिन्दी, फारसी तथा देवनागरी दोनों शैली में लिखी जाती थी। कुछ मुसलमानों ने हिन्दी (हिन्दवी) की उस शैली का विकास किया जिसकी परम्परा फारसी लिपि और उच्चारण में दिल्ली और आस-पास के प्रदेश में व्याप्त थी। दक्षिण के मुस्लिम हिन्दी कवियों ने हिन्दी को एक विशिष्ट शैली में ढाला जो भविष्य में उर्दू की चीज मानी गई। हिन्दू और मुसलमानों के राजनैतिक विरोध के कारण हिन्दी का विरोध बढ़ने के कारण मुसलमानो ने उर्दू भाषा को नऐ रूप में अपनाया। समय के साथ हिन्दुओ ने भी उर्दू को हिन्दी की एक शैली मान लिया।

1800 ई. में अंग्रेजी के आगमन के साथ ‘हिन्दी‘ को हिन्दुस्तानी नाम मिला। इसमें जन्म लेने वाली भाषा सम्बन्धी उलझन नए रूप में उपस्थित हुई किन्तु उस समय तक ‘हिन्दी‘ पूरी तरह देश में सम्मान प्राप्त कर चुकी थी। यदि भारत का नाम ‘हिन्द‘ है तो यहां की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही हो सकता है। श्री सुनीति कुमार चादुज्र्या के विचार में ‘हिन्दी एक महान सम्पर्क भाषा है।‘ बंगला के विद्वान महापुरूषों ने इसके महत्व का पहचाना।

अतः स्पष्ट है कि हिन्दी जनसामान्य की भाषा है। देश की एकता की सम्पर्क भाषा है। देश की केन्द्रीय शक्ति तथा संतो की भाषा है। इसका क्षेत्र व्यापक है।

हिन्दी का क्षेत्र

भारतीय संघ की भाषा होने के कारण हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। राष्ट्रभाषा के रूप में चयनित हिन्दी का क्षेत्र भौगोलिक रूप में निश्चित किया गया है। यह क्षेत्र उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा की घाटी तथा पूर्व में भागलपुर से पश्चित में अमृतसर तक व्याप्त था। इसका सर्वग्राहा रूप खड़ी बोली ही रहा है। यह साहित्य, पत्रकारिता, स्कूल, काॅलेज, प्रशासन, विधानसभा और विधान परिषदों में दैनिक व्यवहार की भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है। ऐतिहासिक परम्परा के आधार पर विद्वानों ने हिन्दी क्षेत्र के दो भागों में बांटा है- (1)पश्चिमी हिन्दी और (2) पूर्वी हिन्दी। इन दोनो के क्षेत्रों में हिन्दी की अनेक बोलियां प्रचलित है जो वर्तमान में केवल घरों तक ही सीमित है। वास्तविकता में हिन्दी आज सीमाऐं तोड़कर देश और विदेश में गतिमान है। देश की केन्द्रीय शक्ति की मजबूती के साथ हिन्दी और अधिक समृध्द होगी क्योंकि राजनेताओं की अपेक्षा हिन्दी को जनता का सहयोग अधिक प्राप्त है।

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here