कड़वे प्रवचनः राष्ट्रसंत मुनिश्री तरूण सागर जी के प्रवचन – भाग 1

Kadve Pravachan

1- माॅ-बाप होने के नाते अपने बच्चों को खूब पढ़ाना-लिखाना और पढ़ा-लिखा कर खूब लायक बनाना। मगर इतना लायक भी मत बना देना कि वे कल तुम्हे ही ‘नालायक‘ समझने लगें। अगर तुमने आज यह भूल की तो कल बुढ़ापे में तुम्हे बहुत रोना-पछताना पड़ेगा। यह बात मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि कुछ लोग यह भूल जिंदगी में कर चुके हैं और आज वे रो रहे हैं। अब पछताने से क्या होगा जब चिड़िया चुंग गई खेत

2- बच्चों के झगड़ों में बड़ो को और सास-बहू के झगड़े में बाप-बेटे को कभी नही पड़ना चाहिये। संभव हैं कि दिन में सास-बहू में कुछ कहा-सुनी हो जाए तो स्वाभाविक है वे इसकी शिकायत रात घर लौटे अपने पति से करेंगी। पतियों को उनकी शिकायत गौर से सुननी चाहिये, सहानुभूति भी दिखानी चाहिये। मगर सुबह जब सोकर उठें तो ‘आगे पाठ-पीछे सपाट‘ की नीति ही अपनानी चाहिये, तभी घर की एकता कायम रह सकती है।

3- लक्ष्मी पुण्याई से मिलती है। मेहनत से मिलती हो तो मजदूरों के पास क्यो नहीं? जिंदगी में अच्छी संतान, संपत्ति और सफलता पुण्य से मिलती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका इहलोक और परलोक सुखमय रहे तो पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरूर करिये। क्योंकि जिंदगी में सुख संपत्ति और सफलता पुण्याई से मिलती है।

4- संत को गाय-जैसा होना चाहिए, हाथी-जैसा नही। गाय घास खाती है, इसके बावजूद घी-दूध, मक्खन और छाछ देती है। गाय का गोबर भी काम आता है। जबकि हाथी गन्नाख् गुड़ और माल खाता है तो भी समाज को कुछ नही देता। संत-मुनि को घास अर्थात हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिये। मतलब संत-मुनि वे हैं, जो समाज से अंजुलि-भर लेते हैं और दरिया भर लौटा देते हैं।

5- संसार में अड़चन और परेशानी न आऐं। यह कैसे हो सकता है। सप्ताह में एक दिन रविवार का भी तो आयेगा ना। प्रकृति का नियम ही ऐसा है कि जिंदगी में जिता सुख-दुःख मिलना हैं, वह मिलता ही है। मिलेगा भी क्यों नही, टेंडर में जो भरोगे वही तो खुलेगा। मीठे के साथ नमकीन जरूरी है तो सुख के साथ दुःख का होना भी लाजमी हैं। दुःख बड़े काम की चीज है। जिंदगी में अगर दुःख न हो तो कोई प्रभु को याद ही न करें।

6- प्रश्न पूंछा हैः स्वर्ग मेरी मृटठी में हो- इसके लिये मैं क्या करूं? कुछ मत करो। बस इतना ही करों कि दिमाग को ठंडा रखों, जेब को गरम रखो, आंखो में शरम रखो, जुबान को नरम रखो और दिल में रहम रखो। अगर तुम ऐसा कर सकते तो फिर तुम्हे स्वर्ग तक जाने की जरूरत नही हैं। स्वर्ग खुद तुम तक चलकर आएगा। विडंबना तो यही है कि हम स्वर्ग तो चाहते हैं, मगर स्वर्गीय होना नही चाहते।

7- भले ही लड़ लेना-झगड़ लेना, पिट जाना-पीट देना, मगर बोल-चाल बंद मत करना। क्योंकि बोल-चाल के बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। गुस्सा बुरा नही हैं। गुस्से के बाद आदमी जो वैर पाल लेता है, वह बुरा है। गुस्सा तो बच्चे भ्ीा करते हैं, मगर बच्चे वैर नही पालते। वे इधर लड़ते-झगड़ते हैं और उधर अगले ही क्षण फिर एक हो जाते हैं। कितना अच्छा रहे कि हर कोई बच्चा ही रहे।

8- दुनिया में रहते हुये दो चीजों को कभी नही भूलना चाहिये। न भूलने वाली चीज एक तो परमात्मा तथा दूसरी अपनी मौत। भूलने वाली दो बातों में से एक है- तुमने किसी का भला किया तो उसे तुरंत भूल जाओ। और दूसरा किसी ने तुम्हारे साथ कुछ बुरा भी कर दिया तो उसे तुरंत भूल जाओ। बस, दुनिया में ये दो ही बातें याद रखने और भूल जाने-जैसी हैं।

9- तुम अपनी उस बेटी, बहू या बेटे को, जो धर्म और अध्यात्म के प्रति उदासीन हैं, जो संत और सत्संग से दूर भागता है। सिर्फ एक बार मेरी प्रवचन सभा में ले आओ। बस, माॅ-बाप होने के नाते एक बार बुला लाने का काम तुम्हारा है और रोज बुलाने का काम मुझ मुनि तरूण सागर का है। एक बार भी इसलिये कह रहा हूं कि मुझे तुम्हारे घर का पता नही मालूम। यह मेरा अभिमान नही वरन् आत्म विश्वास है। जिसे आप आजमा भी सकते हैं।

10- डाॅक्टर और गुरू के सामने झूठ मत बोलिए, क्योंकि यह झूठ बहुत मंहगा पड़ सकता है। गुरू के सामने झूठ बोलने से पाप का प्रायश्चित और डाॅक्टर के सामने झूठ बोलने से रोग का निदान नही होगा। डाॅक्टर और गुरू के सामने एकदम सरल और तरल बनकर पेश हों। आप कितने ही होशियार क्यों न हों, तो भी डाॅक्टर और गुरू के सामने अपनी होशियारी मत दिखाइये, क्योंकि यहां होशियारी बिल्कुल काम नही आती।

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