भारतीय संस्कृति पर निबंध | Essay in Hindi

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भारतीय संस्कृति पर निबंध

हमारी भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी संस्कृतियों में से एक है। जीवन में त्याग और योग का समन्वय ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। विद्वानों के अनुसार संस्कृति का अर्थ स्वभाव, चरित्र विचार और कर्म के वे अच्छाईयां हैं जो शिष्ट लोगों के जीवन का अंग होती हैं तथा जिनका पालन परिवार, वर्ग, समाज तथा राष्ट्र की विशेषता बन जाता है। संस्कृति में धर्म, समाज, नीति, राजनीति, दर्शन, सा​हित्य, परंपराऐं, मानवीय मूल्य तथा सौंदर्य बोध आदि सभी समाहित होते हैं। हमारे देश की जनसंख्या आज 130 करोड़ से ज्यादा है। इतनी विशाल जनसंख्या होने के बावबूद अनेकता पाया जाना कोई बड़ी बात नही हैं। हमारे देश में करीब दो हजार से ज्यादा जातियां हैं। इसी तरह भाषाओं और बोलियों की संख्या भी पांच सौ से अधिक है। यह भी जरूर पढ़े:— स्वामी विवेकानंद पर निबंध

हमारी संस्कृति सबसे सुखी और प्रसन्न रखना चाहती है। यह वसुधा को ही कुटुम्ब मानने में विश्वास रखती है। भारतीय संस्कृति का मुख्य उद्देश्य सर्वजन हिताय तथा सर्वजन सुखाय है। भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि व्यक्ति जिस रूप में ईश्वर की अर्चना करता है ईश्वर भी उसे उसी रूप में स्वीकार करता है। केवल श्रध्दा सच्ची होनी चाहिये। वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में ईश्वर के विभिन्न रूपों को मानने की स्वतंत्रता थी जो कि निरंतर जारी है। यही कारण हैं कि हमारी संस्कृति में ईश्वर को भिन्न भिन्न नामों से पुकारा जाता है। भारतीय संस्कृति में ईश्वर को भिन्न भिन्न नामों से पुकारा जाता है। भारतीय संस्कृति में ईश्वर के विभिन्न रूपों को मानने की स्वतंत्रता थी जो कि निरंतर जारी है। यही कारण हैं कि हमारी संस्कृति में ईश्वर को भिन्न भिन्न नामों से पुकारा जाता है। भारतीय संस्कृति की एक और विशेषता है कि यह आनन्द प्रधान हे। इससे हमें सीख मिलती है कि सुख—दुख, लाभ—हानि, विजय—पराजय, उत्थान—पतन, हर्ष—विषाद आदि में मानसिक संतुलन और समभाव बनाऐ रखना चाहिये। उक्त गुझा हर भारतीयों में देखने केा मिलते हैं। भारतीय संस्कृति अपनी इन्ही विशेषताओं के कारण आज भी अपने को बचाये हुये है। ऐसे गुण न होने के कारण ही यूनान, मिस्र तथा रोम आदि की संस्कृतियों के बारें में पढ़ने या सुनने को तो मिलता है लेकिन देखने के लिये नही मिलता। ये भी जरूर पढ़ें:— मदर टेरेसा पर निबंध

भारतीय साहित्य, संगीत, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, नृत्यकला आदि को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी संस्कृति वाले भारतीयों का जीवन हमेशा आनन्दपूर्ण रहा है। इस बात का संदर्भ उपनिषद में भी देखने को मिलता है। भारतीय संस्कृति की तीसरी विशेषता है कर्मवाद। इसके तहत यहां किसी को भी कर्म से मुक्ति नही हैं। चारों वर्णों और आश्रमों के लोगों के लिये नियम कर्म आजीवन करने का आदेश है। भारतीय संस्कृति की चौथी विशेषता विचारों की स्वतंत्रता है। वेदों के एकेश्वरवाद, उपनिषदों के ब्रह्मवाद, पुराणों का अवतारवाद, बौध्दों का शून्यवाद, संतो का निगुर्णवाद विकसित करने की खुली छूट है। यदि सरल और साफ शब्दों में कहा जाऐ तो इससे अभिप्राय अपना—अपना मत प्रकट करने या विचार परिवर्तन करने की हमारे देश में हमेशा से स्वतंत्रता रही है।

शासन की ओर से किसी को कोई मत विशेष मानने के लिये बाध्य नही किया जाता। किसी विशाल ह्दय स्वतंत्रता तथा उदारता के कारण हमारे देश में सर्व धर्म समभाव पाया जाता है। मतों या विचारों को लेकर हमारे देश में कभी खून—खराबा नही हुआ। इसको लेकर शास्त्रार्थ, वेद और उपनिषद की उदारता, दर्शनशास्त्रों, जातक ग्रंथों,रामायण और महाभारत में भी दिखाई पड़ती है। पश्चिमी देशों के विद्वान इसी कारण भारतीय संस्कृति पर मुग्ध हो इसका गुणगान करने के लिये बाध्य हुऐ। थोरों, वार्ड, सोपनहावर और मैक्समुलर जैसे अंग्रेजी दार्शनिकों ने भी श्रध्दापूर्वक भारतीय संस्कृति की सराहना की है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सबको अपनानें, सबको गले लगानें, सबके गुणों को ग्रहण करने और सबकी विशेषताओं को सराहनें की शिक्षा देती है।

भारत में शक, कुषाण, हूण, ग्रीक, पारसी, यहूदी, मुसलमान आदि अनेक लोगों ने शासन किया लेकिन सभी भारत की संस्कृति में समाते चले गये। कबीर, नानक आदि जैसे फकीर भारत की संस्कृति में समन्वय लाये और उन्होने जो थोड़ी बहुत विषमताऐं थी उन्हे दूर करने का प्रयास किया। स्वामी दयानन्द स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महात्मा गांधी आदि महानुभवों ने भारतीय संस्कृति में पुन: प्राणों का संचार किया। इनका कहना था कि मानव मात्र का कल्याण करना ही हमारी संस्कृति का मूल तत्व है। पश्चिमी देश जो कि भौतिकवाद में विश्वास रखते थे वे अब भौतिकवाद से मुंह मोड़ने लगे हैं और भारत की संस्कृति की ओर आशाभरी दृष्टि से देख रहे हैं। भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति धीरे—धीरे हावी होती जा रही है। त्याग, तपस्या, दया तथा संतोष का स्थान अब भोगवाद व भौतिकवाद लेता जा रहा है। संस्कृत व हिंदी भाषा को छोड़ जनता अंग्रेजी के पीछे भाग रही है। खान—पान, रहन—सहन, आचार—विचार समेत हर क्षेत्र में हम लोग पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करने लगे हैं। इस प्रकार हम अपनी भारतीय संस्कृति से मुंह मोड़ने लगे हैं।

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