महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह पर निबंध | Essay in Hindi

29
भगत सिंह

शहीद भगत सिंह पर निबंध: भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया जिन शूरवीरों के ​बलिदान ने भारतीय जनमानस को सर्वाधिक उध्देलित किया है, जिन्होने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबाए हैं, जिन्होने परतंत्रता की बेड़ियों को छिन्न भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है, तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक हैं भगत सिंह

भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1970 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगाा गांव (अब ये पाकिस्तान में हैं) में हुआ था। भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह एवं उनके दो चाचा अजीतसिंह तथा स्वर्ण सिंह अंग्रेजो के खिलाफ होने के कारण जेल में बंद थे। यह एक विचित्र संयोग ही था कि जिस दिन भगत सिंह पैदा हुये उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया। इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गई थी। यही सब देखते हुये भगतसिंह की दादी ने बच्च के नाम भाग वाला (अच्छे भाग्य वाला) रखा। बाद में उन्हे भगत सिंह कहा जाने लगा। एक देशभक्त के परिवार में जन्म ​लेने के कारण भगतसिंह को देशभक्त और स्वतंत्रता का पाठ विरासत में पढ़ने को मिल गया। ये भी जरूर पढ़ें:— स्वामी विवेकानन्द पर निबंध

भगतसिंह जब जब चार—पॉच वर्ष के हुये तो उन्हे गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिला दिलाया गया। वे अपने साथियों में इतने अधिक लोकप्रिय थो कि उनके मित्र उन्हे अपने कंधो पर बिठाकर घर तक छोड़ने आते थे। भगत सिंह को स्कूल के तंग कमरों मे बैठना अच्छा नही लगता था। वे कक्षा छोड़कर खुले मैदानों में घूमने निकल जाते थे। वे खुले मैदानों की तरह ही आजाद होना चाहते थे।

प्राइमरी शिक्षा पूर्ण करने के बाद भगत सिंह को 1916—17 में लाहौर के डीएवी स्कूल में दाखिला दिलाया गया। वहां उनका संपर्क लाला लाजपत राय और सूफी अम्बा प्रसाद जैसे देशभक्तों से हुआ। 13 अप्रैल 1919 में रौलेट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इन्ही दिनों जलियावाला कांड हुआ। इस कांड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुॅंचे। देश पर मर—मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रध्दांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होने एक बोतल में रख लिया, जिससे हमेशा याद रहे कि उन्हे अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना हैं। ये भी जरूर पढ़ें:— युग पुरूष महात्मा गांधी पर निबंध

Image Source :- Culture India

1920 के महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगत सिंह ने स्कूल छोड़ दिया। असहयोग आंदोलन से प्रभावित छात्रों के लिये लाला लाजपतराय ने लाहौर में नेशनल कॉलेज की स्थापना की। इसी कॉलेज में भगतसिंह ने भी प्रवेश लिया। पंजाब नेशनल कॉलेज में उनकी देशभक्ति की भावना फलने—फूलने लगी। इसी कॉलेज में ही यशपाल, भगवती चरणख, सुखदेव, तीर्थराम, झंडासिंह आदि क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ। कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब भी था। इस क्लब के माध्यम से भगतसिंह ने देशभक्ति पूर्ण नाटकों में अभिनय ​भी किया। वे नाटक थे ‘राणा प्रताप’,’भारत दुर्दशा’ और ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’

सन 1919 में लागू सुधार अधिनियमों की जॉच के लिये फरवरी 1928 में ‘साइमन कमीशन’ बम्बई में पहुंचा। जगह—जगह साइमन कमीशन के विरूध्द विरोध प्रकट किया गया। 30 अक्टूबर 1928 को कमीशन लाहौर पहुंचा। लाजपत राय के नेतृत्व में एक जुलूस कमीशन के विरोध में शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहा था। भीड़ बढत़ी जा रही थी। इतने व्यापक विरोध को देखकर सहायक अधीक्षक सांडर्स जैसे पागल हो गया था उसने लाठी चार्ज करवा दिया। भगतसिंह यह सब कुछ अपनी आंखो से देख रहे थे। 17 नवम्बर 1928 को लालाजी का देहांत हो गया। भगत सिंह का खून खौल उठा। वे बदला लेने के लिये तत्पर हो गये।

लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिये हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिऐशन ने भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, आजाद और जयगोपाल को यह कार्य सौंपा। इन क्रातिकारियों ने सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लिया। सांडर्स की हत्या ने भगतसिंह को पूरे देश का एक प्रिय नेता बना दिया।

हिन्दुस्तान समाजवाद गणतंत्र संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी की एक महासभा हुई जिसमें ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ तथा ‘डिस्प्यूट्स बिल’ पर चर्चा हुई। इनका विरोध करने के लिये भगत सिंह ने केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकना का प्रस्ताव रखा। साथ यह भी कहा कि बम फेंकते समय इस बात का ध्यान रखा जाऐ कि किसी जीवन की छाति या हानि न हो। इसके बाद क्रांतिकारी स्वयं को गिरफ्तार कर दें। इस कार्य को करने के लिये भगतसिंह अड़ गये कि वह स्वंय यह कार्य करेंगे। आजाद इसके विरूध्द थे लेकिन विवश होकर आजाद को भगत सिंहका निर्णय स्वीकार करना पड़ा। भगत सिंह सहायक बने बटुकेश्वर दत्त।

12 जून 1929 की सेशन जज ने भारतीय दंड संहिता 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 के अन्तगर्त आजीवन कारावास की सजा दी। ये दोनों देशभक्त अपनी बात को ओर अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। इसलिये इन्होने सेशन जज के निर्णय के विरूध्द लाहौर हाईकोर्ट में अपील की। यहां भगत सिंह ने पुन: अपना भाषण दिया। 13 जनवरी, 1930 को हाईकोर्ट ने सेशन जज के निर्णय को मान्य ठहराया।

अब अंग्रेज शासकों ने नए तरीके द्वारा भगत सिंह तथा बहुकेश्वर दत्त का फसाने का निश्चय किया। इनके मुकदमे को ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया। 5 मई 1930 की पुंछ हाउस, लाहौर में मुकदमे की सुनवाई शुरू की गई। इसी बीच आजाद ने भगतसिंह को जेल छुड़ाने की योजना भी बनाई, परंतु 28 मई को भगवती चरण बोहरा, जो बम परीक्षण कर रहे थे, वे घायल हो गये तथा उनकी मृत्यु हो जाने के बाद योजना सफल नही हो सकी। अदालत की कार्यवाही लगभग तीन महीने तक चलती रही। 26 अगस्त, 1930 को अदालत का कार्य लगभग पूरा हो गया था। अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 301 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 तथा 6 एफ तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120 के अंतगर्त अपराधी सिध्द किया ताथा 7 अक्टूबर 1930 को 68 पृष्ठीय निर्णय दिया, जिसमें भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरू को फांसी की सजा दी गई। लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इस निर्णय के विरूध्द नवम्बर 1930 में प्रिवी,परिषद में अपील दायर की गई, परंतु यह अपील 10 जनवरी 1931 को रद्द कर दी गई।

फांसी का समय प्रात:काल 24 मार्च 1931 निर्धारित हुआ था, पर सरकार ने भय के मारे 23 मार्च को सांयकाल 7:33 बजे, उन्हे कानून के विरूध्द एक दिन पहले, प्रात:काल की जगह संध्या समय तीनों देशभक्त क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी देने का निर्णय किया। जेल अधीक्षक जब फांसी लगाने के लिये भगत सिंह को लेने उनकी कोठरी में पहुंचा तो उसने कहा, ‘सरदार जी! फांसी का वक्त हो गया, आप तैयार हो जाइए। उस समय भगत सिंह लेनिन की जीवन चरित्र को पढ़ने में तल्लीन थे। उन्होने कहा ‘ठहरो! एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है, और वे जेल अधीक्षक के साथ चल दिये।

सुखदेव और राजगुरू को भी फांसी स्थल पर लाया गया। भगत सिंह ने अपनी दाईं भुजा राजगुरू की बाई भुजा मे डाल ली और बाईं भुजा सुखदेव की दाई भुजा में। क्षण भर रूके और तब वे यह गुनगुनाते हुये फांसी पर झूल गये—

दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत,
मेरी मिट्टी से भी खूश्बू—ए—वतन आऐगी,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here