आजाद हिंद फौज का गठन करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिये उन्होने जापान की मदद से आजाद हिंद फौज का गठन किया। उनके द्वारा दिया गया नारा ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा’ देखते ही देखते लोकप्रिय नारा बन गया। वहीं जय हिंद का नारा भी भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया।

नेताजी का जन्म, जन्म स्थान व परिवार

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 में उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। वे एक कायस्थ परिवार में जन्मे थे। सुभाष चन्द्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मॉ का नाम प्रभावती था। सुभाष चन्द्र बोस एक सम्पन्न परिवार से थे। उनके पिता कटक शहर के लोकप्रिय वकील थे। वे कटक महापालिका में भी लम्बे समय तक रहे और बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे। सुभाष जी के पिता को अंग्रेजो ने रायबहादुर का खिताब दिया था। वहीं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाना गंगानारायण दत्त भी शहर के जाने माने व्यक्ति थे। सुभाष चन्द्र बोस अपने माता पिता की 9 वहीं संतान थे। वे 14 भाई—बहन थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक ऑस्ट्रियन महिला एमिली से हिन्दू पध्दति के अनुसार प्रेम विवह कर लिया। पत्नी एमिली से सुभाष चन्द्र बोस को एक पुत्री हुई जिसका नाम उन्होने अनीता बोस रखा। अनीसा बोस अभी जीवित हैं। वे अपने पिता के परिवारीजनों से मिलने के लिये भारत आती रहती हैं।

नेताजी की प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर आईसीएस का सफर

सुभाष चन्द्र बोस बचपन से ही काफी होनहार थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा कटक के प्रोटेस्टेण्ट स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद 1909 में उन्होने रेवेनशा कॉलजियेट स्कूल में दाखिला लिया। सुभाष चन्द्र बोस ने मात्र 15 वर्ष की उम्र मे ही विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया। 1916 में बीए करते समय प्रेसीडेंसी कॉलेज में एक छात्रों और अध्यापकों के बीच झगडा हो गया। जिसमें छात्रों का नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस कर रहे थे जिसकी वजह से उन्हे कॉलेज से 1 साल के लिये निकाल दिया गया और और परीक्षा देने के लिये भी प्रतिबंधित कर दिया गया।

सुभाष चन्द्र बोस ने 49वीं रेजीमेंण्ट में भर्ती होने के लिये परीक्षा दी। लेकिन उनकी आंखे खराब होने के कारण उन्हे अयोग्य घोषित कर दिया। लेकिन इसके बाद सुभाष चन्द्र टेरीटोरियल आर्मी के जरिये फोर्ट विलियम सेनालय में रंगरूट के रूप में भर्ती हो गये। उसके बाद सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी पढाई फिर से शुरू की और 1919 में सुभाष चन्द्र बोस ने बीए आनर्स उत्तीर्ण किया।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के पिता चाहते थे कि सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस बनें। आजादी से पहले भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) भारत में सभी सेवाओं में वरिष्‍ठतम थी। लेकिन सुभाष चन्द्र बोस की आयु के अनुसार वे केवल एक बार ही इस परीक्षा के लिये आवेदन कर सकते थे। पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिये सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस की परीक्षा की तैयारी के लिये लंदन चले गये। 1920 में आईसीएस परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो सुभाष चन्द्र बोस को चौथा स्थान प्राप्त हुआ।

आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सुभाष चन्द्र बोस असमंजस में पड गये। सुभाष चन्द्र बोस के आदर्श स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द्र घोष थे। ऐसे में वे आखिर एक आईसीएस अफसर बनकर अंग्रेजों की गुलामी कर पाते। इसलिये सुभाष चन्द्र बोस ने आईसीएस से इस्तीफा दे दिया।

सुभाष चन्द्र बोस से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बनने का सफर

रवींद्रनाथ ठाकुर ने सुभाष चन्द्र बोस का सलाह दी कि वे महात्मा गांधी से मिले। उन दिनों महात्मा गांधी मुम्बई में मणिभवन में निवास करते थे। सुभाष चन्द्र बोस मुम्बई गये और 20 जुलाई 1921 को गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस की पहली मुलाकात हुई। गांधी जी ने सुभाष चन्द्र बोस को कोलकाता के स्वतन्त्रता सेनानी दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। इसके बाद वे कोलकाता आकर दासबाबू से मिले।

उन दिनो दास बाबू गाधी जी के असहयोग आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। सुभाष चन्द्र बोस भी आकर आन्दोलन में सहभागी हो गये। 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अन्तगर्त स्वराज पार्टी की स्थापना की। पार्टी ने कोलकाता महापालिका का चुनाव लड़ा और जीता। उसके बाद दासबाबू कोलकाता के महापौर बने और सुभाष चन्द्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया गया। सुभाष चन्द्र बोस ने अपने कार्यकाल में महापालिका का कार्य करने का तरीका ही बदल दिया। उन्हो कोलकाता के सभी अंग्रेजी नाम बदलकर भारतीय नाम कर दिये। वहीं स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले सेनानियों के परिवार वालों को महापालिका में नौकरिया दी गईं।

इसके बाद सुभाष चन्द्र बोस देशभर में तेजी से लोकप्रिय हो गये। वे युवा नेता के रूप में उभरने लगे। सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के अन्तगर्त युवकों की इण्डिपेण्डेंस लीग शुरू की। 1927 में साइमन कमीशन के भारत आने का जब विरोध हो रहा था तब बंगाल में सुभाष चन्द्र बोस इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। साइमन कमीशन के विरोध में कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनान का काम आठ सदस्य आयोग को सौंपा। इस आयोग की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू कर रहे थे वहीं सुभाष चन्द्र बोस उस आयोग में सदस्य थे। 1928 में कांग्रेस का ​वार्षिक अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस ने खाकी वर्दी पहन कर मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। लेकिन गांधी जी उन दिनो पूर्ण स्वराज्य की मांग को लेकर सहमत नही थे। वे चाहते थे कि अंग्रेज सरकार डोमिनियन स्टेटस का दर्जा दे। लेकिन सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू इससे सहमत नही थे। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज सरकार को डोमेनियन स्टेटस देने के लिये एक साल का समय दिया जाऐ। अगर एक साल के भीतर सरकार ऐसा नही करती है तो फिर कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी।

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परन्तु अंग्रेज सरकार ने इस मांग को नही माना। इसके बाद 1930 में लाहौर में हुये कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में यह तय किया गया कि 26 जनवरी के का दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाऐगा। उसके बाद 26 जनवरी 1931 में कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फहराकर सुभाष चन्द्र बोस ने एक विशाल मोर्चा निकाला। इस मोर्चे को रोकने के लिये पुलिस ने लाठी चार्ज कर दी और नेताजी को जेल में डाल दिया। जब सुभाष बोस जेल में थे तब गांधी जी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया। इस समझौते के तहत गांधी जी ने सभी कैदियों को रिहा करवा दिया। लेकिन अंग्रेज सरकार भगत सिंह को छोड़ने के लिये तैयार नही हुई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी माफ कराने के लिये गांधी जी ने अंग्रेज सरकार से बात की। लेकिन अंग्रेज सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही। सुभाष चन्द्र बोस चाहते थे कि महात्मा गांधी अंग्रेजो से सख्ती से बात करें अगर अंग्रेज सरकार न माने तो गांधी समझौता तोड दें। लेकिन गांधी जी अपना वचन तोड़ने को राजी नही हुऐ और अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी। जिससे कारण सुभाष चन्द्र बोस गांधी और कांग्रेस से बहुत नाराज हो गये।

सुभाष चन्द्र बोस और सरदार वल्लभ भाई पटेल के मध्य विवाद

वर्ष 1933 में सुभाष चन्द्र बोस यूरोप चले गये। वहां वे इटले के नेता मुसोलिनी से मिले। मुसोलिनी ने उन्हे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मदद करने का वचन दिया। सुभाष यूरोप में सरदार ​वल्लभ पटेल के भाई विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल ने सुभाष चन्द्र बोस से मंत्रणा की जिसे पटेल—बोस विश्लेषण के नाम से जाना जाता है। ​इस विश्लेषण में उन्होने गांधी जी के ​नेतृत्व की जमकर निंदा की। कुछ दिन बाद विठ्ठल भाई पटेल बीमार हो गये और बाद में उनका निधन हो गया। विठ्ठल भाई पटेल ने अपने बसीयत में सारी सम्पत्ति सुभाष चन्द्र बोस के नाम कर दी। जिसके बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और सुभाष चन्द्र बोस के मध्य विवाद हुआ और मामला कोर्ट पहुंचा। ये मुकद्मा वल्लभ भाई पटेल ने जीता और सारी सम्पत्ति को गांधी जी के हरिजन सेवा कार्य में भेंट कर दी।

वर्ष 1934 में सुभाष चन्द्र बोस को खबर मिली कि उनके पिता की तबियत खराब है। जिसके कारण कोलकाता वाापस लौटे। कोलकाता लोटने से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। सुभाष चन्द्र बोस के कोेलकाता लोटते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया। कई दिन बाद जेल में रहने के बाद उन्हे वापस यूरोप भेज दिया गया। 1936 में सुभाष फिर से भारत लौट आये।

सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में

1938 में कांग्रेस का 51वां अधिवेशन हरिपुरा में होना तय हुआ। गांधी जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिये सुभाष को चुना। कांग्रेस द्वारा सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत 51 बैलों से खींचे गये रथ में किया गया। अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस ने अध्यक्षीय भाषण दिया। इस भाषण ने सुभाष चन्द्र बोस की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिये। कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुये सुभाष चन्द्र बोस ने योजना आयोग की स्थापना की जिसके पहले अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू बनाये गये। इसके अलावा सुभाष चन्द्र बोस ने बैंगलोर में एक विज्ञान परिषद की स्थापना की जिसकी अध्यक्षता मशहूर वैज्ञानिक सर विश्वेश्वरय्या ने की। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुध्द के आसार शुरू हो गये थे। सुभाष चन्द्र बोस चाहते थे कि इस समय में इंग्लैंड सरकार कमजोर है यही समय जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को तीव्र किया जा सकता है और उन्होने इस ओर कार्य करना शुरू कर दिया लेकिन गांधी जी उनके इस कदम से असहमत थे। वर्ष 1939 में जब कांग्रेस को अपना नया अध्यक्ष चुनना ​था तो गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था। जबकि अधिकांश कांग्रेसी नेता चाहते थे कि सुभाष चन्द्र बोस ही फिर से अध्यक्ष चुने जाऐं। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसके लिये गांधी जी को पत्र भी लिखा। लेकिन गांधी जी अपने फैंसले पर अड़े रहे। इसके बाद तय हुआ कि अध्यक्ष पद के लिये चुनाव होगा और जब चुनाव हुआ तो सुभाष चन्द्र बोस यह चुनाव जीत गये। इस चुनाव के बाद गांधी ने कहा कि सीतारमैय्या की हार गांधी जी की हार है। जिसके बाद कांग्रेस की कार्यकारिणी से 14 में 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। जबकि जवाहर लाल नेहरू और शरदबाबू सुभाष के साथ डटे रहे। इस चुनाव के बाद सुभाष चन्द्र बोस बीमार हो गये। उन्हे कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में स्ट्रैचर पर लाना पड़ा। गांधी जी इस अधिवेशन में शामिल नही हुये। परिस्थितियां ऐसी हो गईं कि सुभाष कुछ काम न कर पाये और 29 अप्रैल 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

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सुभाष चन्द्र बोस की पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन

3 मई 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अन्तगर्त फॉरवर्ड ब्लाक के नाम से एक पार्टी की स्थापना की। जिसके बाद सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस से निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक एक स्वतंत्र पार्टी बन गई। द्वितीय विश्वयुध्द के शुरू होने से पहले ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम को तेज कर दिया। 3 सितम्बर 1939 में ब्रिटेन और जर्मनी में युध्द शुरू की सूूचना को सुभाष चन्द्र बोस ने एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा। जुलाई 1940 में कलकत्ता में स्थित हालवेट स्तम्भ को सुभाष की यूथ बिग्रेड ने उखाड़ फेंका। सुभाष चन्द्र बोस की यूथ बिग्रेड उसकी एक—एक ईंट तक उखाड़ ले गये। इस स्तम्भ को अंग्रेजो की गुलामी का प्रतीक माना जाता था। इस के बाद अंग्रेजों ने सुभाष चन्द्र बोस और फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओं को जेल में बंद कर दिया। जेल में सुभाष चन्द्र बोस ने आमरण अनशन शुरू कर दिया जिससे उनकी हालत खराब हो गई और मजबूर अंग्रेज सरकार को उन्हे रिहा करना पड़ा। लेकिन अंग्रेज सरकार ने उन्हे घर में ही नजरबंद कर दिया।

कैसे अंग्रेजों को चकमा देकर जर्मनी पहुंचे सुभाष चन्द्र बोस

सुभाष चन्द्र बोस अंग्रेजों को चकमा देकर एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन के वेश में अपने घर से निकल गये। वहां से वे पेशावर पहुंचे वहां उनकी मुलाकात किर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार से हुई। दोनो वेश बदलकर काबुल पहुचें। वहां वे उत्तमचन्द मल्होत्रा नाम के एक व्यापारी के घर रूके। वहां वे इटालियान दूतावास में प्रवेश पाने में सफल रहे। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उ नकी मदद की और वे आरलैण्डो मैजोन्टा नामक इटालियन व्यक्ति बनकर रूस की राजधानी मास्को होते हुये जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुंचे।

जर्मनी में सुभाष चन्द्र बोस से हिटलर की मुलाकात

बर्लिन पहुंचने के बाद नेताजी जर्मनी के नेताओं से मिलें। जर्मनी में ही उन्होने भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेड़ियो की स्थापना की। इसी दौरान सुभाष चन्द्र बोस नेताजी के नाम से पहचाने जानते लगे। 29 मई 1942 में सुभाष चन्द्र बोस ने जर्मनी के नेता एडॉल्फ हिटलर से मुलाकात की। लेकिन हिटलर को भारतीय आजादी में कोई रूचि नही थी और उन्होने नेताजी की मदद करने की हामी नही भरी। नेताजी समझ गये कि जर्मनी और हिटलर उनकी कोई मदद नही करेगा और वे अपने साथी आबिद हसन सफरानी के साथ समुंद्री रास्ते से पूर्वी एशिया पहुंच गये।

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पूर्वी एशिया में सुभाष ने भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व संभाला। जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी ताजो ने से नेताजी से प्रभावित होकर उनकी मदद करने का आश्वासन दिया। 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने आर्जी—हुकूमते—आजाद—हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे इस सरकार में खुद ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युध्दमंत्री बनें। इस सरकार को 9 देशों ने मान्यता भी दी। सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन किया। इस फौज में जापानी सेना द्वारा अंग्रेजों की सेना के पकड़े हुये युध्दबंदियों को भर्ती किया। आजाद हिंद फौज में महिलाओं के लिये भी एक रेजिमेंट बनाई गई जिसे झांसी की रानी रेजिमेंट नाम दिया गया। पूर्वी एशिया में ही भाषण के दौरान उन्होने भारतीयों से मदद की अपील की और नारा दिया कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा। द्वितीय विश्वयुध्द के दौरान आजाद हिंद फौज और जापानी सेना ने भारत पर आक्रमण किया। दोनो फोजो नें अंदमान और निकोबर दीप समूह को जीत लिया। इन द्वीपों को नेताजी ने शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप का नाम दिया। सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी सेना को प्रेरित करने के लिये ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। इसके बाद दोनो फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण कर दिया। लेकिन इस बार जीत अंग्रेजो की हुई और दोनो सेनाओं को पीछे हटना पड़ा।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमयी मृत्यु

द्वितीय विश्वयुध्द में जापान हार गया। जिसके बाद नेताजी अपने आंदोलन के लिये रूस की सहायता मॉगने के का निश्चय किया। 18 अगस्त 1945 को नेजाती एक हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गये। इसके बाद वे किसी को दिखाई नही दिये। 23 अगस्त 1945 को टोकियो रेडियो ने घोषणा की जिसके अनुसार नेताजी जिस विमान मे जा रहे थे वो विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। जिसमें नेताजी के साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट और अन्य कुछ लोग मारे गये। वहीं नेताजी गम्भीर रूप से घायल हो गये जिन्हे ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया जहां उन्होने दम तोड़ दिया।

लेकिन सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु रहस्यमयी ही रही। ये हमेशा विवादों के घेरे में रही। समय समय पर ऐसे कई सवाल उठते रहे हैं जो नेताजी की मौत की कहानी को रहस्यमयी बनाते हैं।

  • टोकियो रेडियो के मुताबिक 18 अगस्त 1945 में नेताजी मंचूरिया जाते समय एक हवाई दुर्घटना का शिकार हो गये थे। लेकिन उसी साल 23 अगस्त को जापान सरकार ने इस बात की पुष्टि की कि 18 अगस्त 1945 को जापान में कोई भी हवाई दुघर्टना हुई ही नही थीे। इसलिये भारत में एक बहुत बड़ा तबका ये मानता रहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस विमान दुघर्टना में नही मारे गये ​बल्कि वे किसी साजिश का शिकार हुये थे।
  • रिटायर्ड मेजर जनरल जी.डी. बक्शी ने “Bose: The Indian Samurai – Netaji and the INA Military Assessment” नाम की एक किताब लिखी। ये किताब 2016 में प्रकाशित हुई। इस किताब ने दाबा किया कि नेताजी प्लेन क्रेश में नही मारे गये। ये झूठ ​था जो कि जापान की इंटेजिलेंस ऐजेंसियो द्वारा फैलाया गया था जिससे नेताजी जापान से भाग सकें। किताब के अनुसार नेताजी सोवियत यूनियन भाग गये थे।
  • सुभाष चन्द्र बोस के निजी गनर रहे जगराम ने दावा किया कि अगर विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हुई तो कर्नल हबीबुर्रहमान जिंदा कैसे बच गये। जबकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे।
  • नेताजी की मृत्यु की जॉच के लिये अब तक सरकार द्वारा तीन जॉच कमेटी गठित की जा चुकी हैं। सबसे पहली शाहनवाज कमेंटी 1956 में नेहरू ने गठित की। दूसरी जीडी खोसला कमीशन 1970 में इंदिरा गांधी ने गठित की वहीं तीसरी एनएम मुखर्जी कमीशन 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी ने गठित की। इनमें से दो कमेटी शहनवाज कमेटी और खोसला कमीशन ने माना कि नेताजी की मौत विमान हादसे मे ही हुई थी। लेकिन तीसरी कमेटी एनएम मुखर्जी कमीशन ने इसके उलट दावा किया। मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट 17 मई 2006 में लोकसभा में पेश की गई। इस रिपोर्ट नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में होने की संभावना को नकार दिया।

क्या फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही सुभाष चन्द्र बोस थे

एक बड़े वर्ग का यह भी मानना हैं कि फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी ही सुभाष चन्द्र बोस थे। 17 सितम्बर 1985 को गुमनामी बाबा की मृत्यु के उपरान्त उनके कमरे से ऐसे कई सामान व प्रमाण मिले जो इस बात की ओर इशारा करते थे कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे। गुमनामी बाबा के पास से मिले सामानों में हर वर्ष 23 जनवरी को मनाये जाने वाले नेताजी के जन्मोत्सव की तस्वीरें, लीला रॉय की मौत पर हुई शौक सभाओं की तस्वीरें मौजूद थीं। नेताजी की तरह ही दर्जनो गोल चश्मे और 555 सिगरेट और विदेशी शराब मिली। वहीं सुभाष चन्द्र बोस के माता—पिता और परिवार की तस्वीरें और आजाद हिन्द फौज की यूनिफॉर्म भी मिली।

इसके अलावा उनके कमरे से जर्मन, जापानी और अंग्रेजी साहित्य की ढ़ेरो किताबें भी मिलीं। वहीं सुभाश चन्द्र बोस की मृत्यु के लिये बनी जॉच समिति शहनवा और खोसला आयोग की रिपोर्ट भी मिली। ये सभी दस्तावेज इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करते थे कि वेश बदलने में माहिर सुभाष चन्द्र बोस गुमनामी बाबा के वेश मे रह रहे थे।

Source : Times of india

खबरों के अनुसार गुमनामी बाबा की मौत कके बाद जब ये खबर फैली कि वे ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं और गुमनामी बाबा के कमरे से मिले सामान को देखकर रोने लगी। उन्हे कहा कि ये सब उनके चाचा की है। जिसके बाद कई जगह प्रदर्शन चले जिनमे मांग की गई थी कि जॉच की जाऐ और गुमनामी बाबा के बारे पूरी जानकारी पता चले। जिससे सरकार बैकफुट पर आ गई और मुखर्जी आयोग का गठन किया। लेकिन ये साबित नही हो सका कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चन्द्र बोष थे। मुखर्जी कमीशन के बाद दो और कमीशन बने, लेकिन दोनो कमीशन ने गुमनामी बाबा को नेताजी मानने से इंकार कर दिया।